आज कितना बदल गया है इंसान...?

गणतंत्र को बचाना है तो भ्रष्ट मंत्रियों को जनयुद्ध के जरिये सरे आम फांसी देनी होगी......

शनिवार, 8 मई 2010

पैसा,किसके बाप का पैसा ---?


सरकार के पास फ्री शिक्षा के लिए पैसे कि कमी है ,पढ़े लिखे व विभिन्न प्रकार के डिग्री जैसे डॉक्टर,इंजिनीअर,पत्रकारिता इत्यादि कि पढ़ाई पूरी करने के बाद भी खाली बैठे लोगों को नौकरी देने के लिए पैसे कि कमी है / आज बैंको में समय से एक काम नहीं हो रहा है,जहाँ कि लोग ह़र ड्राफ्ट के लिए पैसा देते हैं ,लेकिन स्टाफ कि कमी कि वजह से ड्राफ्ट लोगों को तिन से पाँच घंटे बाद मिलता है / गावों में तो स्टाफ कि कमी कि वजह से कभी-कभी कुछ काम को रोक दिया जाता है / यही नहीं ह़र जनकल्यानकारी कामों जैसे पानी,बिजली,सिचाई,स्कूल,सार्वजनिक शौचालय इत्यादि के लिए दिल्ली जो देश कि राजधानी है ,में भी सरकार फंड का रोना हमेशा रोती रहती है /

अब सवाल उठता है कि क्या वास्तव में फंड कि कमी है ? जवाब है नहीं फंड पर्याप्त हैं / फंड तो इतना है कि ह़र स्नातक को स्नातक के डिग्री पाने के बाद के पाँच वर्षों तक कम से कम तिन से पाँच हजार रुपया मासिक उसके आगे के पढ़ाई या किसी प्रकार के व्यवसायिक शोध के लिए दिया जा सकता है / जनता कि ह़र जरूरत कि चीजों को उनके गावं में मुहैया कराया जा सकता है /

अब एक बार फिर वही सवाल कि पैसा होते हुए भी जनता रोती और असहाय क्यों है ? इसका सबसे बड़ा कारण है मंत्रियों द्वारा खर्चों का और योजनाओं का खाका तैयार कर उस पैसे को बंदरबांट करना / दिल्ली में जब मैंने कुछ विधायकों से जानना चाहा कि क्या DTC के बसों कि खरीद से पहले उनसे किसी प्रकार कि राय ली गयी थी ? उनका जवाब था नहीं / अब जब जन प्रतिनिधियों को पूछे वगैर मुख्यमंत्री और पाँच मंत्री किसी अडबों कि खरीद कि रूप-रेखा बना कर ,खरीद को अंजाम देकर गोल-माल कर सकते है ,तो जनप्रतिनिधि जिनको ये सारा खेल पता होता है वो क्यों अपने निधि का पैसा ईमानदारी से जनकल्याण पर खर्च करेंगे / 

अब यह बात समझ से परे है और कोई बताये हमें कि ,जिस सरकारी खजाने को एक गरीब आदमी भी अगर एक पचास पैसे कि माचिस खरीदता है तो ,उस माचिस के पचास पैसे में पाँच पैसे का टैक्स देकर रोज ,ह़र वक्त भरता है और ये मंत्री उसे अपने बाप का माल समझ कर गोल-माल कर देते हैं और जनता भूखी-प्यासी तरपती रहती है / इन मंत्रियों का कुछ न कुछ तो करना ही होगा नहीं तो ये अमानुष आम लोगों को अपना ग्रास बना कर छोड़ेंगे / दोस्तों मैं आप लोगों से आग्रह कर रहा  हूँ कि,आप लोग अपने पैसों को(सरकारी खजाना)  इन लूटेरों से बचाने के लिए आगे आइये और अपने-अपने क्षेत्र में एकजुट होइये, नहीं तो ये भेडिये एक दिन आपके शरीर का खून भी लूट लेंगे /     

8 टिप्‍पणियां:

  1. पूर्णत: सहमत्!समूचे समाज को मिल जुलकर प्रयास करना होगा तभी कुछ सम्भव है...

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  2. ...प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!!

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  3. हमारे जागरूक न होने के कारण ही तो यह सब हो रहा है।

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  4. खून लूट रहें हैं साहब .... बस दिखाई नही दे रहा ... पता नही कब जागेंगें हम लोग ...

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  5. AApki bhawnao ko samjha ja sakta hai. Krantikari ab log nahi rahe sab apne roti sekane mein lage hai jinhe janha mauka milta we wanhi loot suroo kar dete. Aise mein kranti nahi lai jai sakati. "JAB TAK AWAAM LOG IMAANDAAR NAHI HONGE TAB TAK HAMSABON KO YAHI DANSH JHELNA HOGA"

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  6. जिन्दा लोगों की तलाश!
    मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!


    काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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    सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

    हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

    इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

    अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

    आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

    सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

    जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

    (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
    राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666

    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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