आज कितना बदल गया है इंसान...?

गणतंत्र को बचाना है तो भ्रष्ट मंत्रियों को जनयुद्ध के जरिये सरे आम फांसी देनी होगी......

रविवार, 18 अप्रैल 2010

सबसे बड़ी भूल या ---------?

                           
किसी भी इंसान के लिए जीवन का वह पल उसके लिए सबसे दुखदायी होता है--जब उसे सब कुछ मिल जाने के बाद भी हमेशा यह महसूस होता रहता है कि उसने इस जीवन का कैसा उपयोग किया और क्या हाशिल किया ? इसी तरह के आत्म अनूभूति से निकले असंतोष से भरे और भी कई सवाल उसके मन को चौबीसों घंटे जवाब के अभाव में परेशान करता रहता है /
                           जानते हैं,ऐसा ज्यादातर किस प्रकार के व्यक्ति में होता है ? सामाजिक अध्ययन के अनुसार ऐसा ज्यादातर वैसे व्यक्तियों में होता है जो  व्यक्ति अपने जीवन के अच्छे समय का सदुपयोग करने के वजाय दुरूपयोग करता है और किसी अच्छे,सच्चे और शरीफ इंसान के शराफत को उसकी कमजोरी समझ कर उसे बिभिन्न प्रकार से परेशान और मानसिक दुःख पहुँचाने का अपराध करता है / साथ ही वह अपनी गलती को बहादुरी समझ मन ही मन गदगद होकर ऐसे ही अक्षम्य अपराध लगातार करता हुआ अपने पापों का घरा इतना भर लेता है कि वह छलकने लगता है और उसके पास पैसा ,गाड़ी,बंगला ,नौकर चाकर सबकुछ होते हुए भी उसके मन में किसी सुख कि अनुभूति प्राप्त करने कि शक्ति जैसे खत्म हो जाती है /
                       कहतें हैं कि जिस तरह मोबाइल टावर से एक वेब निकलने पर मोबाइल कि घंटी बजती है / ठीक उसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के प्रति जब हम किसी उपकार या प्रतिकार रूप में क्रिया  करते हैं तो ,ह़र क्रिया कि प्रतिक्रया के सिद्धांत के अनुरूप सामने वाले के आत्म शक्ति से बुड़ा या अच्छा वेब निकलता है ,जो हमारे  जीवन के बुरे और अच्छे परिणामों को नियंत्रित करता है / 
                              अगर हमारे बातों पर यकिन ना हो तो आप अपने जीवन में झांक कर देखिये जब कभी भी आप किसी भी गलत काम को अंजाम देंगे आपको उसकी प्रतिक्रया स्वरूप बुड़े परिणाम भुगतने पड़ेगें / 
                        इसलिए ह़र धर्मग्रंथों में एक बात निर्विवाद लिखी गयी है कि -परोपकार पुण्याय ,पापाय पर्पिरनम,अर्थात परोपकार सबसे बड़ा पुन्य है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना ही सबसे बड़ा पाप है / इसलिए हम चाहे   व्यापारी ,अधिकारी,कर्मचारी,मंत्री या सन्तरी क्यों न हो हमें मानवीय मूल्यों और मानवता को सुख पहुँचाने का काम  अपने अधिकारों और कर्तव्यों को ईमानदारी से सदुपयोग करते हुए करना चाहिए /
                                 हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश के उच्च पदों तक में लोभ,लालच से पनपा भ्रष्टाचार इतना बीभत्स रूप ले चुका है कि क्या आम और क्या खास सबका जीवन नरक बनता जा रहा है / ह़र व्यक्ति का इतना स्वार्थ तो होना ही चाहिए कि वह ,उसका परिवार और उसके बच्चे भूखे ना रहें और उनकी मूलभूत जरूरतें पूरी होती रहें / लेकिन सामाजिक असमानता कि भयावहता कुछ लोगों द्वारा अपना और अपने बच्चों कि अय्यासी के लिए दूसरों कि मूलभूत जरूरतों का हिस्सा भी तिकरम,ठगी और अपने कर्तव्यों को करने के वजाय बेचने जिसका दूसरा नाम भ्रष्टाचार है के द्वारा क्षीण लेने कि वजह से पैदा हुई है / कहिं आप और हम तो ऐसा नहीं कर रहें है , कहिं हम अपने लूट कि भरपाई दूसरों को लूटकर तो नहीं कर रहें है ? अगर हमारा जवाब हाँ मे है तो आज ही किसी को लूटना बंद कर देश के खजानों और गरीब-लाचार लोगों के हिस्से का रोटी तक लूटने वालों के खिलाप ब्लॉग के जरिये तब तक जंग जारी रखिये जबतक सारे लूटेड़े डरकर लूट का काम छोड़ न दे / अगर हम अभी से ऐसा नहीं करते हैं तो यह हमारे जीवन कि सबसे बड़ी भूल कहलाएगी? और जिसका परिणाम हमें और हमारे बच्चों को जरूर भुगतना पड़ेगा / 

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